
बस्ती का ‘जुगाड़’ पुल: 21वीं सदी में भी मौत के साये में जीने को मजबूर ग्रामीण
पगारे घाट का 'मौत का पुल': विकास की पोल खोलते प्रशासनिक दावों पर तीखा प्रहार "अब और नहीं चलेगा मौत का यह पुल": रामनगर-गौर मार्ग की बदहाली पर गरजे यशकांत सिंह
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती का शर्मनाक सच: 21वीं सदी में भी ‘जुगाड़’ के पुल पर थमी है जिंदगियां
- रामनगर-गौर संपर्क मार्ग की बदहाली पर फूटा जनाक्रोश; भाजपा नेता यशकांत सिंह ने प्रशासन को दी चेतावनी
- व्यवस्था की विफलता का स्मारक बना पगारे घाट, शासन-प्रशासन के वादे हुए बेनकाब
- बस्ती: पगारे घाट पर कब थमेगा ‘मौत’ का सफर? विकास के दावों के बीच, जुगाड़ पर टिकी जिंदगियां। पगारे घाट: क्या दुर्घटना का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
- ग्रामीणों का फूटा आक्रोश: प्रशासन की उपेक्षा पर यशकांत सिंह का ‘वार’
- अंधेरे में बस्ती का विकास: पगारे घाट की तस्वीरें जो प्रशासन को आईना दिखाएंगी
- पुल या ‘मौत का जाल’? पगारे घाट पर व्यवस्था की विफलता का शर्मनाक सच
बस्ती (वशिष्ठनगर) |
विकास के दावों और आधुनिकता की चकाचौंध के बीच, बस्ती जनपद का एक चेहरा ऐसा भी है जो 21वीं सदी में भी ‘जुगाड़’ के सहारे सांसें ले रहा है। विकास खण्ड रामनगर के नरकटहा और विकास खण्ड गौर के धधरिया को जोड़ने वाला ‘पगारे घाट’ आज शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता का जीता-जागता स्मारक बन चुका है। यहाँ पुल के नाम पर मौत का जो ढांचा खड़ा है, वह न केवल ग्रामीणों की विवशता है, बल्कि विकास के तमाम दावों पर एक करारा तमाचा भी है।
विकास के दावों के बीच ‘उपेक्षा’ का उपहार
पगारे घाट की जर्जर स्थिति को लेकर भाजपा नेता यशकांत सिंह ने प्रशासन और संबंधित विभागों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “पगारे घाट पर मौत का यह पुल अब और नहीं चलेगा।” यशकांत सिंह के अनुसार, जिस संरचना के सहारे हजारों ग्रामीण रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं, उसे पुल कहना पुल शब्द का ही अपमान है।
यह मार्ग केवल दो गांवों को नहीं जोड़ता, बल्कि यह बस्ती और गोंडा के बीच सामाजिक और आर्थिक जीवन रेखा है। किसान अपनी उपज, छात्र अपनी शिक्षा और मरीज अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इसी जर्जर रास्ते के मोहताज हैं। बावजूद इसके, दशकों से ग्रामीण केवल आश्वासन की राजनीति का शिकार हो रहे हैं।
क्या दुर्घटना का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
यशकांत सिंह ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा, “दुर्घटना के बाद जागी हुई नींद किसी काम की नहीं होगी। यदि इस जर्जर ढांचे के ढहने से कोई जनहानि होती है, तो इसकी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर संबंधित विभागों की होगी।”
उन्होंने सरकार को आईना दिखाते हुए कहा कि विकास का असली मूल्यांकन शहर की चमकती सड़कों से नहीं, बल्कि ऐसे गांवों की स्थिति से होना चाहिए जहाँ आज भी लोग लकड़ी और मिट्टी के सहारे जीवन का जोखिम भरा सफर तय कर रहे हैं।
फाइलों में कैद विकास, सड़कों पर मौन
स्थानीय ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधि अब इस समस्या पर चुप्पी साधे हुए हैं। हर बार समस्या को उठाया जाता है, फाइलें तैयार होती हैं, लेकिन वे कागजों के फेर में फंसकर ‘ठंडे बस्ते’ में चली जाती हैं।
यशकांत सिंह की दो-टूक मांगें:
- तकनीकी सर्वे: पगारे घाट पर तत्काल तकनीकी सर्वे कराकर स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए।
- अस्थायी सुरक्षा: बरसात के आने से पहले अस्थायी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि ग्रामीणों की जान खतरे में न पड़े।
व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है पगारे घाट
यशकांत सिंह ने इसे प्रशासनिक सोच की विफलता करार देते हुए कहा कि यह केवल एक पुल का मुद्दा नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें गांवों की मूलभूत आवश्यकताएं वर्षों तक उपेक्षित रखी जाती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन ने अब भी सुध नहीं ली, तो इस मुद्दे को लेकर व्यापक जनआंदोलन छेड़ा जाएगा।
पगारे घाट आज ग्रामीण भारत का वह अनुत्तरित सवाल बन चुका है, जो पूछ रहा है—”आखिर विकास की वह सड़क गांव तक कब पहुंचेगी, जिसका वादा हर चुनाव में किया जाता है?”
















